जावेद क़सीम कौन हैं : परिचय

जावेद क़सीम उर्दू शायरी की उस ख़ामोश लेकिन असरदार आवाज़ का नाम है, जो अपनी सादगी, साफ़गोई और गहराई के लिए जानी जाती है। उनकी शायरी में न तो बनावटी अल्फ़ाज़ हैं और न ही ज़बरदस्ती की उलझनें—बल्कि हर मिसरा एक एहसास, एक सच्ची बात की तरह सामने आता है।

उनकी ग़ज़लों में इश्क़ की मासूमियत भी है और ज़िंदगी की तल्ख़ सच्चाइयाँ भी। वे समाज की बिखरती इकाइयों, रिश्तों की टूटन, और इंसानी जज़्बातों की उलझनों को बड़ी सहजता और संजीदगी से बयान करते हैं। उनकी शायरी में एक सूफ़ियाना लहजा भी झलकता है, जो पाठक को केवल भावनात्मक नहीं बल्कि वैचारिक स्तर पर भी झकझोरता है।

जावेद क़सीम उन शायरों में से हैं जो शब्दों से शोर नहीं, बल्कि सुकून पैदा करते हैं। वे अपनी रचनाओं से न सिर्फ़ दिलों को छूते हैं, बल्कि इंसान को अपने अंदर झाँकने पर मजबूर भी कर देते हैं।

उनकी शायरी आज के दौर की उलझनों के बीच एक सच्ची आवाज़ बनकर उभरती है—नरमी से कही गई बातों में भी असर की शिद्दत लिए हुए। वे अदब की उस परंपरा से जुड़े हैं जो तहज़ीब, सोच और एहसास को एक साथ लेकर चलती है। उनके अशआर पढ़ना, जैसे किसी दरिया की धीमी रफ़्तार को महसूस करना है—गहराई लिए, लेकिन बेआवाज़।

जावेद क़सीम कौन हैं : परिचय












जावेद क़सीम

  • पूरा नाम: मोहम्मद जावेद क़ुरैशी
  • तख़ल्लुस / उपनाम: क़सीम
  • जन्म तिथि: 29 अगस्त 1964
  • जन्म स्थान: उरई, ज़िला जालौन, उत्तर प्रदेश

जावेद क़सीम का असली नाम मोहम्मद जावेद क़ुरैशी है। शायरी की दुनिया में उन्होंने अपना तख़ल्लुस (उपनाम) "क़सीम" चुना, जो उनकी शख़्सियत की संजीदगी और तहज़ीब को बख़ूबी बयान करता है। उनका जन्म 29 अगस्त 1964 को उत्तर प्रदेश के शांत, सांस्कृतिक और साहित्यिक माहौल से सराबोर कस्बे रई (ज़िला जालौन) में हुआ। ये वही ज़मीन है जहाँ मिट्टी में तहज़ीब घुली होती है और हवाओं में अदब के तरन्नुम की ख़ुशबू होती है।

शैक्षणिक और पेशागत जीवन:

जावेद क़सीम ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रई से ही प्राप्त की। स्कूली जीवन के दौरान ही उनके भीतर शायरी के प्रति एक स्वाभाविक झुकाव दिखाई देने लगा था। बाद में उन्होंने दिल्ली से इंजीनियरिंग (सिविल ब्रांच) में ग्रेजुएशन किया और सिविल इंजीनियर के तौर पर पेशेवर ज़िंदगी की शुरुआत की। वो आज भी निर्माण (Construction) के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और इसी ज़रिये उन्होंने देश और विदेश — दोनों जगहों में काम किया है।

शायरी की शुरुआत और प्रेरणाएँ:

बचपन से ही घर का माहौल साहित्य और अदब से जुड़ा हुआ था। उर्दू शायरी, ग़ज़ल और नज़्म की आवाज़ें घर की दीवारों से टकराकर उनके कानों में उतरती रहीं। यही वजह रही कि विज्ञान और गणित की सूखी ज़मीन पर चलते हुए भी उनका दिल शायरी की नमी भरी ज़मीन में महफूज़ रहा

शुरू में उन्होंने कई बड़े और नामवर शायरों से मुलाक़ात की, सलाह ली और अपने अशआर पर राय ली। इसी दरम्यान उनकी मुलाकात झांसी के मशहूर शायर सिराज तनवीर साहब से हुई, जिनकी शागिर्दी उन्होंने इख़्तियार की। यहीं से उनकी शायरी को एक नयी दिशा, गहराई और ऊँचाई मिली।

विदेश प्रवास और साहित्यिक सक्रियता:

वर्ष 2000 के बाद से वे दुबई (संयुक्त अरब अमीरात) और फिर सऊदी अरब में काम के सिलसिले में रहने लगे। लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहने का हुनर बहुत कम लोगों में होता है, और जावेद क़सीम उनमें से एक हैं। देश से दूर रहकर भी उन्होंने उर्दू अदब के साथ अपनी वफ़ादारी बनाए रखी।

दुबई और भारत — दोनों जगहों में मुशायरों में शिरकत करते हैं, और वहाँ पर मंचों से पढ़े गए उनके शेर श्रोताओं के दिलों में गूंज बनकर बस जाते हैं। हालाँकि अभी तक उनका कोई शायरी संग्रह (ग़ज़लों की किताब) प्रकाशित नहीं हुआ है, लेकिन सोशल मीडिया, अख़बारों और यू-ट्यूब जैसे मंचों के ज़रिये उनकी शायरी का व्यापक प्रचार हो रहा है।

उनकी शायरी की विशेषताएँ:

जावेद क़सीमؔ की ग़ज़लें सीधी, सच्ची और असरदार होती हैं। उनमें न ज़्यादा अलंकार हैं, न बनावट — बल्कि एक साफ़गोई, एक दिल से निकली हुई बात होती है जो सीधे पाठक या श्रोता के दिल में उतर जाती है।

उनकी शायरी में:

  • इश्क़ की सच्चाई है
  • ज़िंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों का एहसास है
  • समाज की टूटती इकाइयों पर चिंता है
  • और साथ ही एक फलसफ़ाना सोच भी है जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती है।

उनके कुछ शेर गूगल पर खोजने से भी मिलते हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि उनकी शायरी इंटरनेट की दुनिया में भी अपनी जगह बना रही है।

भविष्य की योजना और वचनबद्धता:

जब उनसे संवाद किया गया, तो उन्होंने बताया कि वे अपनी सभी ग़ज़लों को सुरक्षित रखते हैं और जल्द ही एक संकलन को प्रकाशित करने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने अपने कुछ चुनिंदा अशआर भी साझा किए हैं, जिनसे उनके काव्य-रुझान, संवेदनशीलता और गहराई का स्पष्ट परिचय मिलता है।

जावेद क़सीम उन चुपचाप चलने वाले मुसाफ़िरों में से हैं जो शोर नहीं मचाते, लेकिन जब उनके शब्द काग़ज़ या मंच पर उतरते हैं तो एक अद्भुत मौन गूंज पैदा करते हैं। वे उन लोगों में से हैं जो दुनिया की भीड़ में भी अपनी पहचान को सहेज कर रखते हैं — और उसी पहचान को अब शब्दों की शक्ल देने की ओर अग्रसर हैं।

हमें विश्वास है कि जब उनका शायरी संग्रह प्रकाशित होगा, तो उर्दू अदब को एक नई और नर्म आवाज़ मिलेगी, जो दिलों को सुकून भी देगी और सोच को झकझोरने की ताक़त भी रखेगी।


 

 


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